November 18, 2019

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन-shree kashi vishvanaath

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन-shree kashi vishvanaath , श्री विश्वनाथ मन्दिर काशी में स्थित है। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी उत्तर प्रदेश में है । बारह ज्योतिलिंगो में से एक है। ये मंदिर पौराणिक समय से हिन्दुओ का महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। ये 12  ज्योतिलिंगो में से नौवे नंबर का ज्योतिलिंग माना जाता है। ये मंदिर वाराणसी में प्राचीन समय से बना हुआ है। कशी विश्वनाथ मंदिर हज़ारो वर्षो से हिन्दुओ का तीर्थ स्थल रहा है। ये पर्यटक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। क्योकि यहाँ सालभर लाखो यात्री घुमने आते है। ये एक बहुत सुंदर पर्यटक स्थान है। हिन्दू धर्म में इस मंदिर का विशेष स्थान है। प्राचीन कथा मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति एक बार इस मंदिर के दर्शन कर लेता है। और यहाँ बहती गंगा में स्नान कर अपने सभी पापो को दूर कर लेता है। उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास-kaashee vishvanaath mandir ka itihaas

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन-shree kashi vishvanaath,हिन्दू धर्म भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने का विशेष महत्त्व माना जाता है। भारत एक वीर और महान संतो की भूमि है। भारत में बहुत से महान पुरुष हुए है- स्वामी विवेकानंद जी, दयानन्द सरस्वती जी, गोस्वामी तुलसीदास जी आदि जन्में है। महान व्यक्तित्वों ने भी काशी विश्वनाथ की पवित्र यात्रा की थी। संत एकनाथ जी ने अपना वारकरी सम्प्रदाय का ग्रन्थ श्री एकनाथजी भागवत इस जगह लिखा था। एक रात की बात है। जब महारानी अहिल्या बाई को भगवान् शिव ने सपने में आकर दर्शन दिए थे। अहिल्या बाई शिव जी की बहुत बड़ी भक्त थी।

शिव जी के सपने में दर्शन देने पर अहिल्या बाई ने उनका मंदिर बनवाने का निश्चत किया। अहिल्या बाई ने 1780 में मंदिर का निर्माण कार्य शुरू करवाया। अहिल्या बाई द्वारा बनाई ये वास्तुकला इंदौर की शानदार धरोहरों में से एक है। आज के समय में भी इस मंदिर की बनावट और आकार वैसा ही जैसा अहिल्या बाई ने बनवाया था। समय-समय पर अन्य राजाओ ने भी इस मदिर के अस्तित्व को बनाये रखने के अपना योगदान दिया है।

महाराजा रणजीतसिंह जो की 1853 ईसवीं में पंजाब के राजा हुए थे। उन्होंने भी अपनी सम्पति से 1,000 किलोग्राम सोने से इस मंदिर के शिखरों को सोने से निर्मित करवाया था। जो आज भी अपने अस्तिव में खंडे है। इस मंदिर क सामान एक मोक्ष लक्ष्मीविलास मंदिर भी बहुत प्रसिद्द है। मोक्ष लक्ष्मीविलास मंदिर में 5 मंडप बने हुए है।

इसी के तरह कशी विश्वनाथ मंदिर में भी 5 मंडपों को बनाने का प्रयत्न किया गया। विश्वनाथ मंदिर पूर्व दिशा के कोने में स्थित होने के करण मंडप नही बन सके। इसलिए इस मंदिर के दोनों और विशाल शाला मंडप बनाये गये थे। इसके अलावा इस मंदिर का विकास उत्तरप्रदेश की सरकार द्वारा भी किया गया था। मंदिर के जो शिखर स्वर्ण के बने है,उनके नीचे के हिस्सो को भी स्वर्ण मंडित करने के प्रयास सरकार द्वारा वर्तमान में जारी है।

काशी एक एसी जगह है जहाँ के कण-कण मे हर चमत्कार के पीछे धार्मिक कहानियां पाई जाती हैं। लोगो की मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ के दर्शन मात्र से ही व्यक्ति का कल्याण हो जाता है। यहाँ आने से श्रद्धालुओ की सभी मनोकामनाए पूर्ण हो जाती है। यहाँ भगवान् शिव के शिव के विराट और बेहद दुर्लभ रूपों के दर्शन करने का सौभाग्य रूपी फल हमे मिलता है। और यहाँ प्रवाहित गंगा मया में स्नान करने से सभी पाप मुक्ति मितली हैं।

कशी विश्वनाथ मंदिर हिन्दू विश्वविधालय के परिसर में स्थित है। कहने को तो इसकी संरचना नई है,लेकिन लोगो की आस्था और मंदिर के प्रति महत्व आज भी वैसा है, जैसे प्राचीनकाल में था। यहाँ देश-विदेश से लाखो श्रद्धालु प्रतिवर्ष आते है। धार्मिक ग्रंथो में यहाँ आकर भगवान शिव के दर्शन और रूद्राभिषेक करने का विशेष महत्व माना गया है। ऐसा करने से श्रद्धालुओ को पापो से मुक्ति और मोक्ष प्राप्त होती है।

लोगो की धार्मिक आस्था के अनुसार यहाँ देवता वास करते है। यहाँ गंगा नदी का पवित्र जल बहता है। स्वर्ग के समान ये स्थल सभी को सुखदायक लगता है। और सावन माह में इसकी यात्रा पर जाने का विशेष महत्व माना जाता है। क्योकि ये महिना भगवान् शिव का सबसे प्रिय माना जाता है। यहाँ के लोगो की मान्यता है कि सावन के महीने भगवान् स्वयं इस स्थान पर विचरण करते है।भगवान् शिव को हिन्दू विश्वविधालय के प्रांगन में काशी के राजा से संबोधित किया जाता है। श्रद्धालुओ द्वारा भगवान शिव को बाबा विश्वनाथ नाम से भी पुकारा जाता है।

श्री विश्वनाथ मन्दिर कहानी-shree vishvanaath mandir kahaanee

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन-SHREE KASHI VISHVANAATH
shree-vishvanaath-mandir

काशी विश्वनाथ ज्योतिलिंग भारत में विद्यमान बारह ज्योतिलिंगो में सबसे प्रमुख ज्योतिलिंग है। क्योकि ये भगवान् शिव का सबसे प्रिय ज्योतिलिंग माना जाता है। हिन्दू धर्म के अनुसार इसके पीछे एक विशेष कहानी है। जो भगवान शिव और माता पार्वती पर आधारित है। जब भगवान् शिव हिमालय पर्वत पर अपनी पत्नी पार्वती के साथ निवास करते थे। भगवान् शिव की ध्यान अवस्था और प्रतिष्ठा में कोई बाधा उत्पन्न ना हो। इसलिए माता पार्वती ने भगवान् को अन्य उचित चुनिए।

राजा दिवोदास की नगरी वाराणसी थी। जो की बहुत ही सुन्दर और अद्भुत थी। भगवान् शिव को दिवोदास की वाराणसी नगरी बहुत भा गई थी। इसलिए भगवान् शिव के प्रिय शिवगण निकुम्भ ने वाराणसी नगरी को निर्मनुष्य स्थान में बदल कर,उस जगह को बिलकुल शांत बना दिया था। जब इस बात का पता राजा को लगा तो राजा बहुत दुखी हुए। राजा ने भगवान् ब्रम्हा की बहुत कठिन तपस्या की और ब्रम्हा जी को अपनी व्यथा बताई। और उनसे अपने दुख; को दूर करने को कहा था। सुख की कामना की।

तब भगवान् ब्रम्हा को राजा ने कहा की देवताओ के देवलोक ही उचित स्थान है। इसलिए वे देवलोक में निवास करे तो अच्छा है। ये धरती मनुष्यों के लिए है। राजा की बात सुनकर ब्रम्हा जी ने भगवान् शिव को इस जगह को छोड़कर मंदराचल पर्वत पर जाने को कहा। भगवान् शिव उस स्थान को छोडकर चले गए थे।

लेकिन अभी भगवान् शिव अपने ह्रदय से काशी नगरी के मोह त्याग नहीं सके थे। उनका मन उसी काशी नगरी पर अटका हुआ था। इसलिए भगवान विष्णु जी ने राजा को नगरी छोडकर तपोवन में जाने का आदेश दिया था। इसके महादेव जी वाराणसी में स्थायी रूप से निवास करने लगे थे। शिव जी ने वाराणसी नगरी की अपने त्रिशूल पर स्थापित किया था।

श्री विश्वनाथ मन्दिर कहानी 2-shree vishvanaath mandir kahaanee 2

काशी के विश्वनाथ से सम्बंधित एक अन्य कथा भी है। एक समय की एक बात जब भगवान् ब्रह्मा जी और विष्णु भगवान के बीच ये बहस हो गयी थी कि सबसे बड़ा कौन है। तो तय कर के ब्रह्मा जी अपने वाहन हंस के ऊपर बैठकर स्तम्भ का ऊपरी छोर ढूंढ़ने निकले और भगवान् विष्णु जी निचला छोर ढूंढने निकले पड़े। उस समय उन्हें स्तम्भ में से प्रकाश निकलता हुआ प्रतीत हुआ। तो उस प्रकाश में से भगवान शिव जी रूप नज़र आया।

उस प्रकाश से बाहर निकलकर शिव दोनों देवताओ के सामने प्रकट हुए। इस घटना के बाद भगवान विष्णु जी ने तो अपनी हार स्वीकार कर ली, कि वे स्तम्भ के अंतिम छोर को नही ढूंढ़ सके। लेकिन ब्रह्मा जी ने इस बारे असत्य बोला , और कहा मैंने अंतिम छोर खोज लिया था। क्योकि वे खुद को सबसे महान बाताना चाहते थे। इसलिए भगवान् शिव ने ब्रह्मा जी के झूठ बोलने पर उन्हें,

श्राप दिया कि उनकी पूजा विश्व में कभी नहीं होगी। क्योंकि ब्रम्हा जी ने स्वयं की पूजा कराने के लिए झूठ बोला था। इसी कारण उस समय के बाद ब्रम्हा जी का पूजन नही किया जाता है। उसी समय से शिव जी ज्योतिर्लिंग के रूप में उस स्थान पर विराजमान हुए थे।

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन-shree kashi vishvanaath

कहानी 3

हिन्दू धर्म में एक प्राचीन घटना का प्रचलन भी है,की भगवान् शिव ने स्वयं अपने एक ख़ास भक्त के सपने में आये थे। और भगवान् शिव ने अपने भक्त को गंगा में स्नान करने को कहा। गंगा में स्नान समय तुमे दो शिवलिंगों दिखाई देगी। उन दोनों शिवलिंगों को एक साथ जोड़कर उनकी स्थापना करनी होगी।

जिससे शिव और पार्वती के अंश रूपी अवतार होगे। शिव के भक्त ने सब कुछ वैसे ही किया जैसा भगवान् शिव ने उसे करने को कहा था। भक्त को ये सब कुछ एक चमत्कार के भांति प्रतीत हुआ। और उसने उन पवित्र शिवलिंगों की स्थापना करवाई। जिसमे भगवान् शिव और पार्वती दिव्य स्वरूप विद्यमान है।

काशी विश्वनाथ के रोचक तथ्य

यहाँ निवास करने वाले सभी लोगो की भगवान् शिव के प्रति असीम आस्था है। इसलिए यहाँ रहने वाले प्रत्येक मनुष्यों के घरो में भगवान् शिव के भक्त देख सकते है। यहाँ निवास करने वाले सभी व्यक्ति की जुबान पर सिर्फ एक ही जाप सुनने को मिलता है- हर-हर महादेव। यहाँ के क्षेत्र में घर-घर में ये ही वाणी सुनने को मिलती है। और काशी की नगरी भगवान् शिव को भी अतिप्रिय है। धार्मिक कथा के अनुसार भगवान् शिव के मन में एक से दो होने की इच्छा जगी।

इसलिए भगवान् शिव ने दो रूप धारण किये। एक शिव के रूप में और दूसरा माँ शक्ति के रूप में लिया। इस अवतार में संत्तान प्राप्ति नही होने पर वे बहुत निराश और उदास रहते थे। उन्हें आकाशवाणी द्वारा आदेश मिला कि उन्हें तपस्या करनी पड़ेगी। उस आदेश का पालन कर भगवान् शिव ने एक 5 कोष लम्बे और विशाल भू-खंड का क्षेत्र स्थापित किया। और उसी पर भगवान् शिव विश्वनाथ अवतार में तपस्या करने के लिए विराजमान हो गये थे।

यहाँ होती है मोक्ष की प्राप्ति

लोगो की धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों को हिन्दू धर्म विशेष में महत्व है। जिसमे से काशी विश्वनाथ ज्योतिलिंग भगवान् शिव को अधिक प्रिय माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि काशी विश्वनाथ मंदिर की यात्रा करने का बहुत पुण्य है। काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन मात्र से मनुष्यों को मोक्ष मिल जाता है। गंगा नदी में स्नान करने से से श्रद्धालुओ के पाप नष्ट हो जाते हो जाते है। ये बहुत ही पवित्र स्थान है।

और हिंन्दुओ का प्रमुख तीर्थ स्थल है। काशी में जिस व्यक्ति ने भी देह त्याग करने वालो के कर्ण में भगवान् शिव स्वयं शिव तारक मंत्र का उच्चारण करते है। जिससे व्यक्ति को सभी मोह-माया से मुक्ति मिल जाती है। उसके लिए स्वर्ग के द्वार खुल जाते है।हिन्दुओ के पौराणिक ग्रन्थ मत्स्यपुराण में बताया गया है, कि जप, तप और बिना भगवान् के ध्यान के बिना मनुष्यों को कभी मोक्ष की प्राप्ति नही हो शती है। लेकिन एक बार काशी विश्वनाथ के दर्शन करने मात्र से व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

सूर्य की पहली किरण काशी में पड़ती है

प्राचीन काल से लोगो का ऐसा ऐसी मानना है कि जब सूर्य उदय होता है तो उसकी पहली किरण इस पवित्र स्थल पर पड़ती है। इसलिए लोगो की धारण है की भगवान शिव इस समय स्वयं कैलाश पर्वत को छोड़कर यहाँ आते है। काशी में निवास करने वाले लोगो की आस्था भगवान शिव के प्रति बहुत ही अटूट है।

उनका कहना कि भगवान शिव स्वयं हमेशा उनकी मुसीबत में मदद करते है। उनके हर संकट को दूर करते है। और विपति में उनकी रक्षा करने शिव स्वयं आते है। काशी भगवान शिव को 12 ज्योतिलिंगो में से सबसे प्रिय है। पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत इसी स्थान से ही मानी जाती है।

काशी विश्वनाथ मंदिर दर्शन समय-kaashee vishvanaath mandir darshan samay

साल भर काशी विश्वनाथ मंदिर भक्तो की भीड़ से भरा रहता है। यहाँ विश्व भर से लाखो श्रद्धालु आते है। इसलिए काशी विश्वनाथ मदिर के द्वार साल के 12 महीनें भक्तों के लिए खुला रहता है। ये विशेष कर हिन्दुओ का धार्मिक स्थल है। इसलिए यहाँ आये श्रद्धालुओ में हिन्दुओ की संख्या सबसे अधिक पाई जाती है।

यहाँ हर रोज भगवान् शिव की प्रतिदिन 5 बार पूजा-आरती होती है। सभी भक्त पूजा में उपस्थित होकर भगवान् शिव की पूरी निष्ठा से पूजा में शामिल होते है। इस पूजा का श्रद्धालुओ में विशेष मान्यता है। इसमें शामिल होने से व्यक्त को पुण्य की प्राप्ति होती है। काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान् शिव की होने वाली 5 आरतियाँ का समय क्रम इस तरह है,

सबसे पहले प्रात;काल में मंगला आरती का समय 03:00 से 04:00 के बीच का रहता है। दूसरी भोग आरती का समय सुबह 11: 15 से 12: 20 के अन्तराल का है। तथा संध्या आरती की आरती का समय शाम को 07:00 से 08:15 के मध्य का रहता है।

श्रृंगार आरती का समय रात में 09:00 से 10:00 के समयकाल में की जाती है। और सबसे अंत में भगवान् शिव की शयन आरती की जाती है, जिसका समय रात्रि में 10:30 से 11:00 बजे तक का होता है।

काशी विश्वनाथ मंदिर में महाशिवरात्रि की धूम

हिन्दुओ के धार्मिक ग्रंथो के आधार पर ये कहा जाता है,महा शिवरात्रि के दिन भगवान शिव और पार्वती जी का विवाह हुआ था। इसलिए काशी विश्वनाथ मंदिर में ये दिन बहुत ही शुभ माना जाता है। यहा महाशिवरात्रि बहुत ही धूम-धाम से मनाई जाती है। भगवान् शिव और माता पार्वती का विवाह रंगभरी एकादशी के दिन हुआ था। काशी में निवास करने वाले सभी लोग इस दिन को त्यौहार के रूप में बहुत ही चाव से मनाते है।

महाशिवरात्रि के दिन यहाँ के लोग भगवान शिव और माता पार्वती की मुर्तियो को पालकी मे सजाकर पूरी काशी नगरी में परिक्रमा करते है। सुंदर-सुदर झांकिय और ढोल-नगाडो के साथ नाचते हुए परिक्रमा करते है। भगवान शिव के सबसे प्रिय वाद्य यंत्र ढोल-डमरू भी श्रद्धालुओ द्वारा बजाये जाते है। सभी लोग मस्ती में डूबे हुए एक दुसरे को गुलाल लगाते है। महाशिवरात्रि के दिन काशी विश्वनाथ के दर्शन करने देश-विदेश से श्रद्धालुयो की भीड़ उमड़ती है। श्रद्धालु इस दिन भगवान् शिव के दर्शन कर पुण्य प्राप्त करते है।

काशी विश्वनाथ सोने का मंदिर

इस  मंदिर को सोने से निर्मित किया गया है। इसलिए इस स्वर्ण मंदिर या सोने का मंदिर भी कहा जाता है। क्योकि इस मंदिर के निर्माण में 1000 किलोग्राम का सोने का उपयोग किया गया है। राजा रणजीत सिंह जो की लाहौर रियासत के राजा हुए थे। इस मंदिर के निर्माण के लिए राजा रणजीत सिंह ने 1000 किलोग्राम सोना भेंट के रूप में दिए थे। काशी विश्वनाथ मंदिर के शिखर पर तीन गुंबदो का निर्माण किया गया है। इन गुंबदो को पूरी तरह से सोने से बनाया गया है। ये गुंबद देखने में बहुत ही सुंदर लगते है।

 

काशी विश्वनाथ मंदिर की बनावट

भगवान् शिव की विशाल शिवलिंग काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित है । ये भगवान् शिव की भव्य और सबसे बड़ी शिवलिंग है। इस विशाल शिवलिंग के अलावा विश्वनाथ मंदिर में अन्य छोटे-छोटे मंदिर भी स्थापित किये हुए है। जिनमें प्रमुख मंदिर है- काल भैरव , अविमुक्तेश्वर, विष्णु ,विनायक , सनिश्वर ओर विरूपाक्ष आदि भव्य मंदिर है। विश्वनाथ शिवलिंग की लम्बाई 60 cm तक की है।और इसकी औसत परिधि 90 cm है। इस विशाल शिवलिंग को चाँदी से सजाया गया है।

इस पुरे शिवलिंग को चांदी के आवरण से पूरी तरह ढक दिया है। मंदिर के परिसर में एक छोटा सा कुआँ भी बना हुआ है। इस कुए को ज्ञानव्यापी नाम से जाना जाता है। प्राचीन समय में किसी भी युद्ध से बचने के लिए इस कुँए का निर्माण किया गया था। एक समय की बात है,जब किसी शत्रु द्वारा इस मंदिर पर आक्रमण किया गया था। भगवान शिव ने पुजारी को आक्रमण से रक्षा हेतु कुए में कुदने की आज्ञा दी। और पुजारी ने कुए में कूद कर अपने प्राणों की रक्षा की थी।

काशी विश्वनाथ मंदिर को बार-बार तोड़ा गया

प्राचीन समय में काशी विश्वनाथ मंदिर सन 1194 में ये मंदिर क्षतिग्रस्त हुआ था। मुग़ल रियासत के राजा कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा इस मंदिर को ध्वस्त किया था। इस मंदिर का पुन निर्माण सुल्तान इल्तुमिश द्वारा करवाया था। सुल्तान इल्तुमिश गुजरात के एक धनवान व्यापारी माने जाते है। सुल्तान इल्तुमिश का शासन काल 1211 से 1266 के बीच गुजरात में हुआ करता था।

हुसैन शाह शर्की व सिकंदर लोधी के शासन काल में विश्वनाथ मंदिर को दुबारा से नष्ट किया गया था। तथा कुछ समय पश्चात् राजा मानसिंह अकबर के शासन काल में राजा बने थे। तब राजा मान सिंह द्वारा इस मंदिर का निर्माण कार्य 1669 में वापस शुरू किया गया था।

काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शनीय स्थल

काशी नगरी में देवताओ का का वास माना जाता है। क्योकि ये स्थान देवों का प्रमुख पवित्र स्थल है। यहाँ देवता वर्ष भर विचरण करते है। काशी नगरी में सभी देवताओ असंख्य मंदिर बने हुए है। काशी विश्वनाथ यहाँ का सबसे प्रसिद्द मंदिर माना जाता है। क्योकि प्राचीन कथाओ के अनुसार काशी नगरी का निर्माण भगवान् शिव द्वारा किया गया था।

इसलिए ये काशी विश्वनाथ के नाम से पुरे विश्व में जानी जाती है। काशी नगरी में और भी बहुत सारे मंदिरो का निर्माण हुआ है। जिनका हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है। ये मंदिर भी पर्यटक दृष्टि से बहुत उपयोगी है। विश्वनाथ मंदिर के बाद यात्री इन सब मंदिरों के दर्शन भी करने जाते है। जिनमे कई प्रसिद्द मंदिर है-

अन्नपूर्णा मंदिर वाराणसी

अन्नपूर्णा मंदिर वाराणसी में स्थित है। ये काशी विश्वनाथ मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर स्थित है। ये हिन्दुओ का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर में माता अन्नपूर्णा की बहुत ही सुंदर प्रतिमा विराजमान है। ये देवी हिन्दुओ की मान्यता अनुसार अन्न की देवी मानी जाती है। ये देवी पुरे विश्व को अन्न प्रदान करती है। माँ अन्नपूर्णा को तीनों लोकों की माता कहा जाता है। क्योकि भगवान् शिव को माता अन्नपूर्णा ने स्वयं अपने हाथों से भोजन खिलाया था। इसलिए इन्हें पुरे विश्व में माँ अन्नपूर्णा के नाम से जाना जाता है।

साक्षी गणेश मंदिर वाराणसी

साक्षी गणेश मंदिर बनारस का बहुत ही प्रसिद्द मंदिर माना जाता है। इस मंदिर का धार्मिक दृष्टी से विशेष महत्व है। जब यात्री पंचकरोशी की यात्रा करने जाते है, तो यात्री की यात्रा पूरी होने के बाद वे साक्षी गणेश मंदिर के करना कभी नही भूलते है। क्योकि यातत्रा के बाद साक्षी गणेश के दर्शन करना बहुत शुभ माना जाता है। इस मंदिर के दर्शन करने से ही भक्तो को यात्रा का सम्पूर्ण पुण्य मिलता है।

विशालाक्षी मंदिर वाराणसी

बनारस में साक्षी गणेश मंदिर के अलावा एक अन्य प्रसिद्द मंदिर भी है। जिसका नाम विशालाक्षी मंदिर है। ये बनारस का बहुत ही शानदार मंदिरों में से एक है।बनारस के विशालाक्षी मंदिर से कुछ ही दूरी पर काशी विश्वनाथ मंदिर की स्थापना की गई है। विशालाक्षी मंदिर माँ के 51 शक्तिपीठों में से एक है। ये माता सत्ती का विशेष मंदिर माना जाता है। ऐसा कहा जाता है, की इस जगह माता सती की आँखे गिरी थी। इसलिए ये स्थान धार्मिक दृष्टि से बहुत शुभ माना जाता है।

प्राचीन भैरव मंदिर

काशी में विश्वनाथ मदिर के अलावा एक अन्य प्राचीन मंदिर भी स्थित है। ये मंदिर प्राचीन भैरव के नाम से जाना जाता है। ये भैरव मंदिर काशीनाथ मंदिर से 2 किलोमीटर की दुरी पर बना हुआ है। लोगो की धार्मिक मान्यता के अनुसार इस मंदिर की एक विशेष विशेषता है। काशी के विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करने के बाद भक्तो को काशी के काल भैरव के दर्शन करने भी जरुरी है। तभी श्रद्धालुओ की काशी विश्वनाथ यात्रा पूर्ण मानी जाती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *