November 18, 2019
अमरनाथ गुफा का इतिहास और महत्व् /History and importance of the Amarnath cave

बाबा बर्फानी की अमरनाथ यात्रा ।barfani baba amarnath yatra

बाबा बर्फानी की अमरनाथ यात्रा ।barfani baba amarnath yatra श्री अमरनाथ धाम एक ऐसा शिव धाम है जो हिंदू की मान्यता है कि भगवान शिव  माँ पार्वती के साथ साक्षात श्री अमरनाथ गुफा में विराजमान रहते हैं। धार्मिक व ऐतिहासिक दृष्टी से बहुत ही महत्वपूर्ण श्री अमरनाथ यात्रा हम सब के लिए बहुत पवित्र और स्वर्ग की प्राप्ति का माध्यम है। इस पावन गुफा में  बर्फीली बूंदों से बनने वाला हिम शिवलिंग ऐसा भगवन शिव का चमत्कार है जिसे देखने के लिए हर भक्त उत्साहित रहता है और जो देख लेता है वो धन्य हो जाता है। कश्मीर घाटी में स्थित पावन श्री अमरनाथ गुफा एक प्राकृतिक गुफा है। इस गुफा की लंबाई लगभग 160 फुट, और चौडाइ लगभग 100 फुट है। आज इस ब्लॉग मे हम आपको अमरनाथ गुफा मे शिव जी के पधारने का कारण बताएँगे, साथ ही ये जानेगे की यहाँ निवाश कर रहे उन कबूतरों के जोड़ो का क्या रहस्य है ?

एक बार मा पार्वती ने भगवन शिव से पूछा कि ऐसा क्यों है कि आप अमर है और आपके गर्दन में पड़ी नरमुंड की माला का रहस्य क्या है ?  इस पर भगवन शिव ने माँ पार्वती के सवाल का जवाब देना उचित नहीं समझा। उन्होंने उस बात को टालने की कोशिश की, लेकिन पार्वती की जिद के आगे महादेव इस रहस्य को बताने मजबूर होना पड़ा । हिन्दू ग्रंथो में बताया गया है भगवन शिव को इस रहस्य को बताने के लिए भगवान शिव को एक एकांत जगह की आवश्यकता थी।  महादेव भगावन शिव् माता पार्वती को लेकर गुप्त स्थान की तलाश निकल गए।

गुप्त स्थान की तलाश में महादेव ने अपने वाहन नंदी को सबसे पहले छोड़ा। नंदी को जिस जगह पर छोडा उसे ही पहलगाम कहा जाने लगा। जहां से अब अमरनाथ यात्रा की  शुरूआत  होती है। यहां से कुछ आगे जाने पर भगवन शिव ने अपने माथे से चंद्रमा को जिस पे अलग किया वह अब चंदनवाड़ी कहलाती है। इसके बाद महादेव ने अपने गले के सांप को जहा छोड़ा उस जगह को अब शेषनाग बोला जाता है । अमरनाथ यात्रा का अगला पड़ाव गणेश टॉप है। मान्यता के अनुसार सब के बाद इस स्थान पर भगवान शिव ने अपने पुत्र गणेश को छोड़ा था।

इस प्रकार इन सब को पीछे छोड़ने के बाद भगवान शिव ने माता पार्वती के साथ उस अब अब गुफा में प्रेवेश किया। इसमें कोई भी तीसरा प्राणी प्रवेश न कर पाए इसलिए शिव ने गुफा के चारों ओर अग्नि प्रज्ज्वलित कर दिया। जिसके बाद महादेव ने जीवन के उस गूढ रहस्यों को बताना शुरू किया। मान्यता है कि जब कथा समाप्त हुई और भगवान शिव का ध्यान माता पार्वती पर गया तो उन्होंने पार्वती जी को सोया हुआ पाया। तब भगवन शिव की नजर उस कबूतरों के जोड़े पर पड़ी। जो उस समय वो कथा सुन रहे थे।

महादेव को उन पर क्रोध आ गया। फिर कबूतर जोड़ा महादेव के पास आकार क्षमा याचना की, और कहा यदि आप हमें मार देंगे तो आपकी कथा झूठी हो जाएगी। इस पर महादेव ने उस कबूतरों को वर दिया कि वो हमेशा इस स्थान पर शिव और पार्वती के प्रतीक के रूप में रहेंगे। वो सफ़ेद कबूतर का आज भी निवास करते नजर आते है।

अमरनाथ धाम यात्रा की जानकारी 2019

श्री अमरनाथ यात्रा शुरू हो गई है। दरअसल, तमाम कठिनाइयों, बाधाओं और ख़तरों के बावजूद मॉनसून के समय दो महीने चलने वाली यह पवित्र यात्रा एक सुखद एहसास तो होती ही है। यही वजह है कि दिनोंदिन इसे लेकर उत्साह बढ़ता ही जा रहा है। लगातार पैदल चलने के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं होता। अमरनाथ यात्रा धार्मिक यात्रा के साथ  राष्‍ट्रीयता का प्रतीक बन गई है। जम्‍मू कैंप से जब श्रद्धालुओं का समूह  निलता है तो ‘हर हर महादेव ‘ ‘बम-बम भोले’ और ‘जय भोलेनाथ ’ के साथ जब ‘वंदे मातरम्‘ ‘जयहिंद‘ और ‘भारत माता की जय’ के जयकारो से अमरनाथ की वादिया गुज उठती है ।

यही वजह है कि 12 हजार फिट की कठिन चढाई श्रद्धालु पैदल ही आसानी से पार कर लेते है भोलेनाथ की भक्ति में लीन यात्रियों पर आतंकवादियों की धमकियों और हमलों का भी कोई खौफ  नहीं होता । जम्मू से लेकर अमरनाथ तक पूरी यात्रा के दौरान हर -जगह श्रद्धालु यात्रियों की सेवा में भोनेनाथ के भक्तो की और से लंगर ,आराम करने की व्यवस्था की जाती है। श्रद्धालु यात्रियी प्रसाद खाते हुए  भोलेनाथ की धुन में दर्शन के लिए आगे बढ़ते रहते हैं।

History and importance of the Amarnath cave

हिदुस्थान के कश्मीर की खूबसूरत वादियों  की गोदी में स्थित अमरनाथ हिंदुओं का सबसे बड़ा और आस्था वाला पवित्र तीर्थस्थल है।यह यात्रा  खड़ी चढ़ाई  वाली  और खतरनाक है। यहा  पर पिस्सू घाटी के दर्शन होते हैं। अमरनाथ यात्रा में पिस्सू घाटी काफी जोखिम भरा स्थल है।अमरनाथ की ख़ासियत पवित्र गुफा में बर्फ़ से नैसर्गिक शिवलिंग का बनना है। प्राकृतिक हिम से बनने के कारण ही इसे  ‘बर्फ़ानी बाबा’ भी कहा जाता है हिन्दू साल के आषाढ़ से सुरु श्रावण की   पूर्णिमा तक होने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु अमरनाथ यात्रा पर जाते हैं। गुफा में ऊपर से बर्फ के पानी की बूंदें टपकती रहती हैं। यहीं पर ऐसी जगह है, जहां टपकने वाली हिम बूंदों से क़रीब दस फ़िट ऊंचा शिवलिंग बनता है। चंद्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ बर्फ़ के लिंग का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है।

श्रावण की पूर्णिमा को यह अपने सम्पूर्ण में आ जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा हो जाता है। हैरान करने वाली बात है कि शिवलिंग ठोस बर्फ़ का होता है, जबकि आसपास आमतौर पर कच्ची और सॉफ्ट बर्फ़ ही होती है। अमरनाथ जाने के दो मार्ग हैं। पहला पहलगाम होकर और दूसरा सोनमर्ग बालटाल से। जम्मू या श्रीनगर से पहलगाम या बालटाल बस या छोटे वहन से पहुंचना पड़ता है। उसके बाद आगे पैदल ही जाना पड़ता है। कमज़ोर और वृद्धों के लिए खच्चर और घोड़े की व्यवस्था रहती है। पहलगाम से जानेवाला रास्ता सरल और सुविधाजनक है।

बालटाल से अमरनाथ  गुफा का फासला केवल 14 किलोमीटर है, किन्तु  यह खड़ी सीधी चढ़ाई वाला बहुत कठिन और दुर्गम रास्ता है, इसलिए सुरक्षा की नज़र से ज्यादा खतरनाक है, इस रास्ते पर बहुत ही संभल कर चलना होता है   इसलिए  ज़्यादातर यात्रियों को पहलगाम से जाने के लिए बोला जाता है। हालांकि  रोमांच और ख़तरे से खेलने के शौकीन इस मार्ग से जाना पसंद करते हैं। इस रास्ते से जाने वाले लोग अपने रिस्क पर यात्रा करते हैं। किसी अनहोनी की ज़िम्मेदारी सरकार नहीं लेती है। दरअसल, श्रीनगर से पहलगाम 96 किलोमीटर दूर है। यह वैसे भी देश का मशहूर पर्यटन स्थल है। यहां का खूबसूरत सौंदर्य देखते ही बनता है। आरू और लिद्दर नदियां इसकी ख़ूबसूरती बढ़ाती  हैं। अमरनाथ यात्रा का बेस केंप छह किलोमीटर दूर नुनवन में लगता  है।

बाबा बर्फानी की अमरनाथ यात्रा ।barfani baba amarnath yatra

पहली रात सर्द्धालु यही बिताते हैं। दूसरे दिन सूर्य की पहली किरण के साथ यात्री अपनी आगे की यात्रा सुरु करते है यहां से कठिन और खड़ी पहाड़ियों से गुजरते हुए 9 किलोमीटर पैदल चलते हुए चंदनबाड़ी तक पहुंचते हैं। यात्रा यहा आगे फिर से पिस्सू घाटी की चढ़ाई शुरू होती है।  साधु संतो कहते है कि प्राचीन काल में पिस्सू घाटी में देवताओं और राक्षसों के बीच भयनकर युद्ध हुआ था , जिसमें राक्षसों की हार हुई। यहां से आगे यात्रा दहराव 15  किलोमीटर दूर शेषनाग में होता है। लिद्दर नदी के किनारे-किनारे पैदल चलना सर्द्धालु यात्री के बहुत कठिन होता  है।

यह मार्ग खड़ी चढ़ाई वाला और ख़तरनाक रास्ता है। यहाँ पहुंचते पहुंचते यात्रीओ शरीर जमा देने वाली ठंड का सामना पड़ता है। यहां ऊँचे ऊँचे पर्वतओं के बीच नीले पानी की बहुत ही खूबसूरत झील देखने को मिलती है। इन  झील में झांकने पर आसमान प्रतिबिम्ब दिखाई देता है ऐसा अहसास होता है मानो आसमान झील में उतर आया है। बताया गया है कि शेषनाग झील में शेषनाग का निवास स्थान है। दिन में एक बार शेषनाग  झील से  बाहर आते हैं, शेषनाग का दर्शन खुशनसीबों को ही होता है

तीर्थयात्री यहां रात्रि विश्राम करते हैं और यहीं से तीसरे दिन सुबह-सुबह आगे की यात्रा शुरू करते हैं। यहां से बैववैल टॉप और महागुणास दर्रे पार करते हुये 12 किलोमीटर दूर पंचतरणी पहुँचाना होता है। जिनकी समुद्रतल से ऊंचाई लगभग 14500 फ़ीट है। यहां पांच छोटी-छोटी नदियों बहती है जिस कारण ही इसका नाम पंचतरणी पड़ा। पंचतरणी चारों तरफ से पहाड़ों की विशाल चोटियों गोद में बसा है। यहां ऊंचाई की वजह से ठंड भी बहुत ज़्यादा होती है। अब यहाँ से तीर्थयात्री को बाबा अमरनाथ की की पवित्र  गुफा केवल आठ किलोमीटर दुरी का फासला तय करना होता है।

अमरनाथ गुफा का इतिहास /History  of the Amarnath cave

पुरे रास्ते में बर्फ ही बर्फ जमी रहती है। इस कारण इस दिन बाबा भोलेनाथ की गुफा के नज़दीक पहुंचकर यात्री रात को यहाँ विश्राम करते हैं और अगले दिन सुबह-सुबह बाबा अमरनाथ के दर्शन पूजा-अर्चना कर वापस प्रस्थान करते है। रास्ता काफी कठिन है, लेकिन पवित्र गुफा में पहुंचते ही सफ़र की सारी थकान पल भर में मनो गायब हो जाती है और एक अलग ही अदभुत आनंद की अनुभूति होती है।

दरअसल, आसपास का इलाक़ा साल के अधिकांश समय बर्फ़ से ढंका रहता है। जब चंदनवाड़ी या बालटाल से श्रद्धालु निकलते हैं, तो रास्ते भर उन्हें विपरीत  मौसम का सामना करना पड़ता है। पूरा बेल्‍ट यानी चंदनवाड़ी, पिस्‍सू टॉप, ज़ोली बाल, नागा कोटि, शेषनाग, वारबाल, महागुणास टॉप, पबिबाल, पंचतरिणी, संगम टॉप, अमरनाथ, बराड़ी, डोमेल, बालटाल, सोनमर्ग यहाँ  इंसानी गतिविधियां महज यात्रा के दिनों ही रहती हैं।

अमरनाथ धाम यात्रा की जानकारी

बाबा बर्फानी की अमरनाथ यात्रा ।barfani baba amarnath yatra बाक़ी समय यहां का मौसम इंसान के रहने लायक नहीं होता। गर्मी शुरू होने पर यहां बर्फ पिघलनी शुरु होती है और अप्रैल मई से यात्रा की तैयारीया शुरू की जाती है। पवित्र गुफा की ओर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए चंदनवाड़ी से अमरनाथ और बालटाल के बीच ठहरने या विश्राम करने की  कोई उत्तम वयवस्था नहीं होती है । 30 किलोमीटर से अधिक लंबे रास्‍ते में अकसर शरद तेज़ हवा के साथ कभी हल़की तो कभी भारी बारिश होती रहती है और श्रद्धालुओं के पास भीगते  हुये आने के अलावा और  कोई विकल्‍प नहीं है, सो बड़ी संख्‍या में लोग बीमार भी हो जाते हैं। यात्री शेषनाग की हड्डी ठिठुराने वाली ठंड सहन करते हुए बाबा भोलेनाथ भक्ति में लीन एक जोश आगे बढ़ते बाबा अमरनाथ तक पहुंचते है

इसलिए बोलते है भक्ति में शक्ति होती है दरअसल, वैष्‍णोदेवी, अमरनाथ ,बुड्ढा अमरनाथ जैसे धार्मिक स्‍थल वजह से आज आतंकवाद और धमकियों के बावजूद शेष भारत से लोगों, का जम्‍मू कश्‍मीर आना कम होने की बजाय बढ़ता ही गया। पहले वैष्‍णोदेवी की चढ़ाई लो‍कप्रिय हुई, फिर अमरनाथ यात्रा। देश भर से अमरनाथ गुफा जाने वालो की संख्या लगातार बढ़ ही रही है। दरअसल, यह कश्‍मीरियों के आतिथ्‍य का असर रहा है कि सदियों से लोग ख़ूबसूरत पहाड़ों और झीलों का आनंद लेने धरती के इस स्‍वर्ग पर आते रहे हैं।

बेहतरीन मेजबानी के लिए मशहूर कश्‍मीरी आवाम जागरूक और संवेदनशील मानी जाती रही है। यहाँ यात्रिओ को फूल-माला बेचने वाले कश्मीरी होते है। श्रद्धालु हर साल भगवान अमरनाथ के 45 दिन के उत्सव के बीच उन्हें देखने और दर्शन करने के लिये पहुचते है। ज्यादातर श्रद्धालु जुलाई और अगस्त के महीने में श्रावणी मेले के दरमियाँ ही आते है, इसी दरमियाँ हिन्दुओ का सबसे पवित्र श्रावण का महिना भी आता है।

धार्मिक स्थल की जानकारी
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