August 5, 2020
वैद्यनाथ ज्योतिलिंग धाम झारखण्ड-baidyanath dham ka rahasya

वैद्यनाथ ज्योतिलिंग धाम झारखण्ड-baidyanath dham ka rahasya

वैद्यनाथ ज्योतिलिंग धाम झारखण्ड-baidyanath dham ka rahasya, बाबा बैद्यनाथ धाम deoghar, झारखण्ड में स्थित है। वैद्यनाथ ज्योतिलिंग जिस जगह स्थापित किया गया है। उस स्थान को वैद्यनाथ धाम के नाम से जाना जाता है। यहाँ सालभर श्रद्धालु वैद्यनाथ धाम के दर्शन करने आते है। पर्यटक दृष्टि से भी वैद्यनाथ धाम का विशेष महत्व है। इसलिए देश -विदेश से लाखो पर्यटक यहाँ घुमने आते है। वैद्यनाथ ज्योतिलिंग भगवान् शिव के 12 ज्योतिलिंगो में से एक है। हिन्दुओ की धार्मिक आस्था के अनुसार भागवान शिव के पवित्र वैद्यनाथ शिवलिंग श्रद्धालुओ की सभी इच्छाओ को पूरा करता है। इसलिए भक्त अपनी मनोकामनाए लेकर भगवान् शिव के वैद्यनाथ धाम पर आते है।

वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का इतिहास व कथा

वैद्यनाथ ज्योतिलिंग धाम झारखण्ड-baidyanath dham ka rahasya भगवान् शिव के धार्मिक ग्रन्थ शिवपुराण में शिव 12 ज्योतिर्लिंगों का पूर्ण विवरण दिया गया है। भगवान् शिव के सभी ज्योतिलिंगो का अपना अलग-अलग महत्व है। 12 ज्योतिलिंगो में वैद्यनाथ ज्योलिंग नवां ज्योतिर्लिंग है। जो झारखंड के देवघर नामक स्थान पर स्थित है। हिन्दुओ के धार्मिक ग्रन्थ में शिवपुराण के कोटिरुद्रसंहिता में इसका वर्णन किया गया है। इस ज्योतिलिंग के भाग कई स्थानों पर देखे जा सकते है। इसका पहला भाग झारखण्ड के देवघर में स्थित है। दूसरा भाग महाराष्ट्र के परली स्थान पर है। और तीसरा भाग हिमाचल प्रदेश के बैजनाथ नामक स्थान पर स्थित है।

भगवान् शिव के 12 ज्योतिलिंगो के अनुसार महाराष्ट्र के परली वैद्यनाथ ज्योतिलिंग सबसे प्रमुख माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि वैद्यनाथ धाम सिताभूमि के निकट ही स्थित है। माता शक्ति के 51 के शक्तिपीठों में सिताभूमि प्रमुख स्थान है। क्योकि इस स्थान पर माता सती का ह्रदय गिरा था, इसलिए ये माता सती का विशेष शक्तिपीठ कहा जाता है। इस स्थान को ह्रार्दपीठ भी कहते है। शिव पुराण में वैद्यनाथ ज्योतिलिंग को तीन रूपों में विभाजित बताया गया है, लेकिन ये तीनो ज्योतिलिंगो एक ही कथा पर आधारित माने जाते है।

धार्मिक ग्रन्थ पुराण में वैद्यनाथ का वर्णन इस प्रकार से हुआ है। जिससे लोगो की मान्यता यह है कि परलीग्राम स्थान के वैद्यनाथ धाम को ही प्रमुख मानते है। हैदराबाद क्षेत्र के मध्य परलीग्राम स्थान पड़ता है। हैदराबाद के परभणी रेलवे स्टेशन से परली स्टेशन को एक ट्रेन जाती है। परली स्टेशन से परलीग्राम क्षेत्र कुछ ही दुरी पर स्थित है। भगवान् शिव का वैद्यनाथ ज्योतिलिंग भी परलीग्राम के निकट ही स्थापित है।

ये मंदिर बहुत प्राचीन माना जाता है। इसका निर्माण रानी अहिल्या बाई द्वारा करवाया गया था। ये मंदिर एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। पहाड़ी के ठीक नीचे एक छोटी जल धारा बहती है। इस नदी के समीप ही एक छोटा-सा शिवकुंड भी बना हुआ है। तथा पहाड़ी पर चढ़ने के लिए सीढियां का निर्माण किया गया है। जिनकी सहायता से आसानी से मंदिर के दर्शन किये जा सकते है। लोगो के अनुसार वास्तविक वैद्यनाथ ज्योतिलिंग परलीग्राम के निकट बने ज्योतिलिंग को माना जाता है।

वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा-vaidyanaath jyotirling kee katha

शिवपुराण में वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के विषय में एक कथा वर्णित है। कि देवताओं के समयकाल में लंकापति रावण जो की सभी राक्षसों का राजा हुआ करता था। एक बार रावन कैलाश पर्वत पर गया। और वहा उसने भगवान शिव जी की तपस्या की। रावन ने कई सालो तक भगवान शिव की आराधना करता रहा। किन्तु बहुत समय तक भगवान् शिव ने उसे दर्शन नही दिए थे। इसलिए रावण ने दूसरी तप की विधि करना प्रारम्भ कर दिया। लेकिन भगवान् शिव अब भी प्रसन्न नही हुए थे। तब रावण ने अपने शारीरिक अंगो की आहुति देना शुरू कर दिया था।

वह अपने दस सरों में से नौ सर की आहुति दे चुका था। जैसे ही रावण अपने अंतिम सर की आहुति देने ही वाला था कि उसी समय शिव जी ने उसे दर्शन दे दिये। और शिव ने प्रसन्न होकर उसके सरो को वापस यथावत स्थगित किया। रावन को वर मांगने के लिए कहा। रावण ने भगवान् शिव से वर माँगा की आप मुझे सर्व शक्तिशाली प्राणी बना दीजिए। शिव जी ने उसे अपनी इच्छानुसार बल प्रदान किया। रावण बलशाली बनकर बहुत खुश हुआ। उसने भगवान् शिव को प्रणाम करते हुए अपने साथ लंका चलने का आग्रह किया।

वैद्यनाथ ज्योतिलिंग धाम झारखण्ड-baidyanath dham ka rahasya

रावण के वचन पर भगवान् शिव को संदेह हुआ। और शिव जी ने रावण से बोले की तुम मेरे इस लिंग को लिंका में ले जाओ। लेकिन एक बात का स्मरण रखना यदि तुमने इसे रास्ते में किसी स्थान पर रख दिया तो ये लिंग वही स्थापित हो जायेगा। भगवान् शिव की बात सुनकर रावन लंका की चला गया। शिव की लीला का रावण पर असर दिखाई दिया। शिव की माया से रास्ते में रावण को मूत्र उत्सर्जन की इच्छा हुई। रावण बीच रास्ते में ही में रुकना नही चाहता था। इसलिए उसने अपने सामर्थबलशाली था। फिर भी वह मूत्र गति को रोक न पाया। तभी वहा से एक बैजू नाम का ग्वाला गुजर रहा था।

रावण ने उसे विनम्रता पूर्वक शिवलिंग को पकड़ने का अनुरोध किया। कहा जाता है कि भगवान् विष्णु जी ही ग्वाल रूप लेकर रावण के पास आये थे। किन्तु वह ग्वाला ज्यादा समय तक उस शिवलिंग के वजन को उठा नही पाया था। और उसने शिवलिंग को धरती पर रख दिया था। इसलिए वह शिवलिंग सदैव के लिए उसी स्थान पर स्थापित हो गई थी। ये स्थान को कई नामो से प्रसिद्द है-हृदय पीठ, रावणेश्वर कानन, रणखण्ड, हरीतिकी वन, चिताभूमि आदि।

भगवान् विष्णु नही चाहते थे कि रावन द्वारा शिव के इस लिंग को लंका में स्थापित किया जाए। जबकि रावण भगवान् की लीला का समझ गया था। इसलिए चुपचाप भगवान् शिव की आराधना करने लगा। उस स्थान पर अन्य देवता भी उपस्थित हो गये। सभी ने भगवान को प्रणाम कर विधिवत पूजा-अर्चना कर उस स्थान पर शिवलिंग स्थापित किया। तब से इस ज्योतिलिंग का नाम वैद्यनाथ रखा गया। रावण प्रसन्नता से उस स्थान से लंका को चला गया।

इसके बाद सभी देवताओ को ये चिंता सता रही थी,कि भगवान शिव के वरदान से रावण तीनोलोक में क्या अनर्थ करने वाला था। वह कौनसी तबाही करेगा इसका पता लगाने देवताओं ने नारद जी को रावण के समीप भेजा। नारद जी ने लंका में प्रवेश कर रावण के पास गये। और रावण से कहा कि भगवान शिव द्वारा तुम्हे प्रदान की गई शक्ति का तुम्हे प्रशिक्षण करना चाहिए।

इसके लिए तुम एक बार कैलाश पर्वत को उठा कर तुम इसका पता लगा सकते हो कि ये वर कितना सफल है। ये बात सुनकर रावण ने विचार किया और कैलाश पर्वत पहुंचा। उसने अपने बल का उपयोग कर कैलाश पर्वत को उखाड़ दिया था। शिव जी उस वक्त कैलाश पर ही निवास कर रहे थे। रावण के इस दुरशाहस पर भगवान् शिव को बहुत क्रोध आया।

शिव जी ने क्रोधित होकर रावण को श्राप देते हुए कहा कि दुष्ट रावण तुम अपने बल पर बहुत अहंकार करते हो। इसलिए बहुत जल्द धरती पर तुम्हारे इस घमंड ना नाश और तेरा अंत करने वाला अवतार लेगा। इस प्रकार से भगवान् शिव ने रावण को श्राप दिया। भगवान् शिव द्वारा दिए गये रावण को श्राप का प्रभाव हम सभी ने रामायण में देखा।

 

बासुकीनाथ मंदिर का इतिहास-baasukeenaath mandir ka itihaas

वासुकीनाथ मंदिर वैद्यनाथ मंदिर से 42 किलोमीटर दूर स्थित है। ये मंदिर भगवान् शिव को समर्पित है। भक्तो द्वारा वैद्यनाथ धाम की यात्रा करने के बाद वासुकिनाथ के दर्शन भी करने जाते है। ये भी हिन्दुओ का पवित्र धार्मिक स्थल है। वासुकीनाथ के दर्शन किये बिना वैद्यनाथ की यात्रा पूरी नही मानी जाती है। यहाँ भी पर्यटक देश-विदेश से दूर-दूर जगहों से घुमने आते है। साल भर यहाँ भीड़-भाड देखी जाती है। और लोग भगवान् शिव का दूर-दूर से जलाभिषेक करने आते है।

इस मंदिर के आस-पास कई अन्य छोटे मंदिर भी बने हुए है। यहां कावड़िया दूर-दराज से जल लेने आते है। जिनका यहाँ विशेष महत्व माना जाता है। वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का जलाभिषेक करने के लिए यहाँ कांवड़ियाँ सुल्तानगंज में स्थित गंगा जी का पवित्र जल भरकर लाते है। जो इस स्थान से करीब 100 किलोमीटर पैदल यात्रा करके आते हैं। यहाँ जुलाई-अगस्त में श्रद्धालुओ की भीड़ काफी बड़ जाती है। सावन के महीने में यहा विशाल और भव्य मेला लगता है।

यहाँ भगवान को चढ़ाए जाने के लिए प्रसाद चूड़ा और पेड़ा मुख्य रूप से मिलता है। लोगो को ऐसी धारणा है कि इस मंदिर का निर्माण भगवान विश्वकर्मा जी ने निर्माण करवाया था। भगवान् शिव की शिवलिंग को रावण द्वारा इस स्थान पर रावण छोड़ जाने भगवान विष्णु स्वयं इस स्थान पर प्रकट हुए थे। शिव भगवान की विधि – विधान से पूजा की थी। तब शिव भगवान ने विष्णु जी से मंदिर निर्माण की बात कही थी।

भगवान् विष्णु जी ने शिव जी के आदेश का पालन करते हुए, इस स्थान पर मंदिर निर्माण किया। यहाँ आने वाले भक्तो की इस शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही सभी मनोकामनाए पूर्ण हो जाती है। इसलिए इसे मनोकामना लिंग के नाम से भी जाना जाता है। भगवान् शिव के इस लिंग के दर्शन करने से भक्तो के सभी कष्ट दूर हो जाते है।