November 19, 2019
प्रयागराज, tourword

इलाहाबाद के आसपास के पर्यटन स्थल ।Weekend getaway from paryagraj

प्रयागराज {इलाहबाद } भारत के सबसे पुराने शहरों में से एक है। प्रयागराज हिन्दू धर्म के सबसे प्रमुख स्थल है यह हिन्दू प्राचीन ग्रंथों में ‘प्रयागराज ’ के नाम से जाना जाता है और इसे भारत के सबसे पवित्र तीर्थ स्थल है। यह तीन नदियों- गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर स्थित है। समागम-बिंदु को त्रिवेणी के रूप में जाना जाता है और यह हिंदुओं के लिए बहुत ही पवित्र है।क्‍योंकि ये वाराणसी के बाद भारत का सबसे प्राचीन शहर है। साथ ही इस शहर में भारत की तीन प्रमुख नदियां गंगा, यमुना और सरस्‍वती का संगम भी होता है, जिसे त्रिवेणी संगम के नाम से जाना जाता है प्रयागराज में प्रत्येक छः वर्षों में कुंभ और प्रत्येक बारह वर्षों में महाकुंभ, इस धरती पर तीर्थयात्रियों का सबसे बड़ा आयोजन होता है जिसमे भारत से ही नहीं विदेशो में करोड़ो सर्धालु श्रद्धा से आते है

  1. ऐतिहासिक रूप से, प्रयागराज शहर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा –  1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उभरने, 1920 के दशक में महात्मा गांधी की अहिंसा आंदोलन की शुरुआत।

भौगोलिक दृष्टि से, प्रयागराज उत्तर प्रदेश के दक्षिणी हिस्से में 26  डिग्री उत्तर तथा 82  डिग्री पूर्व पर स्थित है। इसके दक्षिणी और दक्षिण पूर्व में बागेलखण्ड क्षेत्र, पूर्व में मध्य गंगा घाटी या पूर्वांचल, दक्षिण-पश्चिम में बुंदेलखंड क्षेत्र, उत्तर और उत्तर-पूर्व में अवध क्षेत्र है। पश्चिम में कौशाम्बी के साथ प्रयागराज दोआब बनाता है जिसे निछला दोआब क्षेत्र कहते हैं। प्रयागराज के उत्तर में प्रतापगढ़, पूर्व में संत रविदासनगर, दक्षिण में रीवा (म०प्र०) तथा पश्चिम में कौशाम्बी स्थित हैं। जिले का कुल भौगोलिक क्षेत्र 5482 वर्ग मीटर किमी है । जिले को 8 तहसील, 20 विकास खंड में विभाजित किया गया है।

इलाहाबाद का इतिहास

पुराने समय मे प्रयाग के नाम से प्रसिद्ध, प्रयागराज एक  उप-द्वीप पर स्थित है। उत्तर प्रदेश के दक्षिणी भाग में बसा ये सुंदर शहर तीन पवित्र नदियों के मेल पर स्तिथ है – गंगा, यमुना और सरस्वती। हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार, यह ज़मीन भगवान ब्रह्मा ने चुनी थी, जो ‘पकृष्टा याजना’ के निर्माता भी हैं । तब से इस शहर को ‘प्रयाग’ के नाम से जाना जाता था और माना जाता था कि यहाँ देवताओं का आशीर्वाद है। प्रयागराज  की पवित्रता को देखते हुए, इस जगह को भगवान ब्रह्मा ने ‘तीर्थ राज’ का नाम दिया था, जिसका मतलब है सभी तीर्थ केंद्रों का राजा। एक प्रमुख तीर्थ केंद्र होने के अलावा, आधुनिक भारत के गठन में भी इस शहर का महत्वपूर्ण योगदान है।  मुस्लिम शासक अकबर यहां आया और उसने इस जगह के हिंदू महत्व को समझा, तो उसने इसका नाम 1583 में बदलकर ‘अल्लाह का शहर’ इलाहाबाद रख दिया।

इलाहाबाद के लोग और संस्कृति

मध्यकालीन के दौरान, उत्तर प्रदेश के इस पवित्र शहर को भारत का धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र होने का सम्मान मिला। लंबे समय के लिए यह शहर मुग़लों की प्रांतीय राजधानी थी, जिसे बाद में मराठों ने कब्ज़ा कर लिया। इलाहाबाद का ब्रिटिश इतिहास 1801 ईस्वी में शुरू हुआ जब औध के नवाब ने शहर को ब्रिटिश शासन को सौंप दिया। अकबर द्वारा निर्मित प्रसिद्ध इलाहाबाद किला का उपयोग ब्रिटिश सेना ने अपने सैन्य कामों के लिए किया। 1857 ईस्वी तक यह शहर स्वतंत्रता के युद्ध का केंद्र बन गया और इस प्रकार ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1858 ईस्वी में भारत को, आधिकारिक तौर पर, ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया गया था। आजादी के पहली लड़ाई के बाद, इस शहर को आगरा और औध के संयुक्त प्रांत की राजधानी बना दिया गया था। इस प्रकार, यह शहर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का केन्द्र रहा और आनंद भवन का यहाँ अलग महत्व रहा है। इसी खूबसूरत शहर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भारत को मुक्त करने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसा प्रतिरोध कार्यक्रम का प्रस्ताव रखा था।

संगम का समानार्थी , इलाहाबाद उत्तर प्रदेश के पवित्र शहरों में से एक है, जहां महाकुंभ 12 साल में एक बार होता है। महाकुंभ और अर्धकुंभ के अलावा, माघ मेला हर साल आयोजित किया जाता है। इसे मग मेला इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह हिंदू कैलेंडर की बीच (जनवरी-फरवरी) में पड़ता है। ऐसा माना जाता है कि संगम में डुबकी लेने से भक्तों को पाप या अपराध से मुक्त कर दिया जाता है। इस दौरान गंगा नदी के किनारे कई तीर्थ यात्रियों की सुविधा के लिए एक टाउन-शिप की व्यवस्था की जाती है। भारत के अलग अलग हिस्सों के लाखों भक्त इस शुभ मेले में भाग लेते हैं।

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